गुरुवार, 27 दिसंबर 2012

यात्रा

  साल    दर   साल   बीते
समय  अभी भी हमारी परीक्षा ले रहा था
हम  अपने- आपको
अपनी - अपनी कसौटियों पर कस    रहे थे
और एक दूसरे को
हारा  हुआ घोषित  कर रहे थे
न  जाने कहाँ से
हम दोनों के बीच
कई बहाने आ खड़े हुए थे
और हम दोनों
उन बहानों  की डोर पकड़े
एक सदी की यात्रा पर चले गए थे /

जहाँ से तुम्हें जाना था
उस कत्थई दुनिया में
जहाँ रिश्तों के धागों में बंधा
एक गुलाबी पेड़ खड़ा था
तुम हँस रहे थे
तुम्हारी  हँसी
पृथ्वी को   ढाढ़स  दे  रही थी
बची रहेगी हरियाली
और बचा रहेगा वह आकाश
जहाँ तोतों के झुंड
अपने पंखों से
नया इतिहास रच रहे होंगे /

मुझे भी जाना था
पृथ्वी के उस आखिरी छोर  पर
जहाँ एक बूढ़ा अपनी बुझती हुई आँखों से
अपने बचपन का इंतज़ार कर रहा था
याद कर रहा था वह
अपने पुरखों को , अपने खेतों को
शायद  अब वह अकेला था
पुरखे , खेत
इतिहास बन चुके थे /


गुरुवार, 13 दिसंबर 2012

दिदिया

बरसों  बाद   दिदिया की याद आई थी
हम चकित थे
उनकी  यादों को हम
दूर अतीत के किसी मोड़ पर
पीछे छोड़ आये थे /

बचना चाहते थे हम
उनकी बुझती  हुई आँखों में
उठते  हुए सवालों से /

दिदिया , जो हमारे लिए
बरसते  बारिश में
छतनार का पेड़ थीं
जिनकी हथेलियों में
हमारे बचपन की डोर थी
घनघोर अँधेरे में वे हमारे लिए
उम्मीद  का एक दीया थीं /

 न जाने कहाँ से एक दिन
दिदिया केलिए  फरमान आ गया था
लौटना था उन्हें
नेह - मोह .. सबकुछ छोड़कर /
हमारी जिद ,  हमारी  प्रार्थनाएं
सब  धरी की धरी रह गईं
हम दिदिया को रोक नहीं  पाएं /

बड़ी जल्दी थी उन्हें
पता नहीं  किस लोक जाना था /

रह - रहकर उनकी आँखें
कहीं दूर किसी प्रार्थना  में
डूब जाती थीं

अक्सर  एक नाम , एक चेहरा , एक इंतज़ार
उनके सफ़ेद  पड़ते
श्रीहीन    चेहरे  पर
अनचाहे  अतिथि की तरह
आ खड़ा होता था /

ऊपर से हंसती हुई दिदिया में
दुःख चुपचाप दहाड़े मारता  था
विकट  अकेलेपन में भी दिदिया ने
मंगल - गीत ही गाये  थे
औरों के लिए /

..... एक अलस्सुबह
दिदिया चली  गईं  थीं
आश्वस्त  हुए थे हम
दिदिया मुक्त हुईं
उन सबसे
जिनसे वे  आजीवन बंधी रहीं
हमने उनकी  स्मृतियों  की पोटली को
बांधकर  रख दिया था
हम उन्हें याद करना नहीं चाहते थे
क्योंकि
हम उन्हें बेहद प्यार करते थे ...../ 
उन्हें याद करना
दुःख के देश में
यात्रा पर निकलना था
हम यात्री नहीं थे
अब हम द्वीप बन चुके थे /

शनिवार, 1 दिसंबर 2012

ज़िंदा हूँ मैं ?

  मैं  अपनी  मुट्ठी  में कुछ सपने लेकर
 गाँव  से शहर  आया था
सोचा था सपने पूरे  होते ही
गाँव लौट जाऊंगा /
साल दर साल बीते
मैं गाँव  लौट नहीं पाया
मेरे सपने हाथ की लकीरों में
कहीं खो गएँ

सोचता हूँ
हिसाब भी लगता हूँ
इन गुजरे हुए साल , महीनों और दिनों का
जो किसी पुल के  खम्भे की तरह

धड़ा धड़  गुजर गए
और इन गुजरे  हुए  सालों , महीनों और दिनों को
मैं सलीब की तरह अपने कन्धों पर उठाये
भागता रहा , भागता रहा , भागता रहा /

आज  मैं बूढ़ा  हो चला हूँ
मेरे सपने भी अब बुढा  गए हैं
  झुर्रियों से थरथराते  हुए
अक्सर   स्मृतियों  के बियाबान में
चला जाता हूँ
जहाँ
कुछ चेहरे  याद आते हैं
जो अब बिछुड़ चुके हैं /

सोचता हूँ
वे चेहरे  जिनसे मैं प्यार करता था
ज़िन्दगी के घुमावदार  रास्तों पर
न जाने किस मोड़ पर
मुझसे छूट  गएँ /

आज  मैं निर्जन टापू पर छोड़ दिए गए
उस आदमी की तरह जिन्दा हूँ
जिसे अब कहीं नहीं लौटना है /

सपने ! सपने ! सपने!
सपनों की बहुत बड़ी कीमत
चुकानी पड़ती है दोस्तों !
सपने तो जिन्दा हैं अब भी
मेरी बूढी दिपदिपाती आँखों में
पर मेरे अपने मुझसे खो गए हैं
मैं रोता हूँ उस मासूम बच्चे की तरह
जिसका प्यारा खिलौना टूटकर चकनाचूर  हो गया है /

मेरी सिसकियों में
 प्रार्थनाएँ  गूंज रही होती हैं
मैं मन ही मन बुदबुदाता हूँ
कुछ नाम , कुछ चेहरे
जो मेरी आँखों में आँसू
की तरह अटके हुए हैं /

शनिवार, 24 नवंबर 2012

ओ मेरे देश !

सुनते हो , ओ मेरे देश , सुनो
तुमसे कहती हूँ
मैं तुम्हें प्यार करना चाहती हूँ
महसूस करना चाहती हूँ तुम्हारे दर्द को /
कुछ छिपाना मत मुझसे
जानती हूँ
बहुत व्यथित हो तुम/
तुम्हारे रहनुमाओं  ने
तुम्हें हाशिए पर फ़ेंक दिया है /
तुम दुखी हो
अपनी  उन संतानों   से
जो तुमसे प्यार करना
आउट  ऑफ फैशन मानती हैं /

तुम याद करते हो रात- दिन
उनको जो ग्रीन कार्ड पाकर
भूल चुके हैं तुम्हें /

क्या कहा ?
याद करते हैं वे भी तुम्हें
 हाँ- हाँ , याद आया
पन्द्रह  अगस्त को शायद या
छब्बीस जनवरी को/

ओ मेरे देश , सच -सच बतलाना
वे याद करते हैं या तुम /

क्या हुआ मेरे दोस्त ???
तुम्हारी आँखें नम हैं
चिंतित हो
उन भेड़ियों के झुण्ड  से
जो तुम्हें लूट रहे हैं /
डरे हुए हो
उन चेहरों से
जो तुम्हें तुम्हारी ही भुजाओं से
अलग करना चाह रहे हैं  /
उदास हो
ऐसी नस्ल से
जिसने अभी तक तुमसे प्यार करना ही नहीं सिखा /


मत उदास हो , ओ मेरे देश
उम्मीद रख मेरे वतन।।।।
सरफरोशी की तमन्ना
अभी भी कुछ दिलों में है /







बुधवार, 21 नवंबर 2012



                         घोड़े बेचकर सॊना



लॊग कहते हैं मैं घॊड़े बेचकर सॊता हूं
पर मैं घॊड़े पर सवार हॊकर
नींद की दुनिया में दाखिल हॊता हूं/
जहां पुरखॊं का खेत
हरिया रहा हॊता है
गांव की सरजू नदी
कॊई पुराना बिसरा राग अलाप रही हॊती है
मठिया का महुआ का पेड़
गम गम कर महक रहा हॊता है
और वह ठ्कूरी बाबा का मंदिर
कनैल फूलॊं और अगरबत्तियॊं की
सुगंध में झूम रहा हॊता है/

मेरी नींद की दुनिया में
गांव के खेत , नदी,महुआ का पेड़,ठ्कूरी बाबा का मंदिर-
सब वहां खेत में ढेलॊं की तरह रहते हैं
बारिश में प्रेमी जोड़ॊं की तरह भींगते  हुए
गरमी में सूरज की तरह तपते हुए
और सरदी में बॊरसी की आग लिये
आजी की तरह कांपते हुए/

मेरे घॊड़े लगातार दौड़े जा रहे हैं
अब शहर की सीमा में वे दाखिल हॊ चुके हैं
जहां शॊर मचा हुआ है
हर आदमी भीड़ में तब्दील हॊ चुका है
लॊग भागे जा रहे हैं या
भगाये जा रहे हैं
इस शॊर में , इस भागमभाग  में
मेरी आत्मीयता बुरादे की तरह झड़ रही है
मेरा चेहरा कहीं निकलकर
दूर जा गिर पड़ा है/
शहर, जॊ कभी संभावना  के सपने पालता था
आज वहां एक औरत सिसक रही है
पूछ्ने पर बताती है
शहर अब इतिहास की तरह
मर चुका है/

मेरी नींद मुझे झकझॊरती है
मन चुपचाप सॊया हुआ है
डरता है कहीं गांव
उससे  छिन न जाये/
पुरखॊं का खेत, सरजू नदी, महुआ का पेड़, ठ्कूरी बाबा का मंदिर-
इन्हें ही तॊ वह बचाना चाहता है
अपनी स्मतियॊं में/
वह नहीं चाहता कि
वह घॊड़े बेचकर सॊए/           

















बुधवार, 14 नवंबर 2012

मेरे पिता





        जब  आकाश अंधड़ से घिरा था
मेरे पिता, तुम रोशनी  की तलाश में
एक दिया जला रहे थे /


सोया था मैं अपनी ही नींद में
जगे थे तुम सारी - सारी  रातें
मेरे हिस्से का सपना
तुमने अपनी आँखों में पाला  था /

चाँद पर जाना था मुझे
तारों को मुट्ठी  में लेना था
आसमान में  सूराखें करनी थीं मुझे
और मेरे पिता , तुम श्रम के बीहड़ जंगल में
लोहा पीट रहे थे
खदान में उतर रहे थे /

सुरमई दुनिया में दाखिल था मैं
और मेरे पिता , तुम अपने कन्धों पर
पृथ्वी का बोझ उठाये
दृष्टि से ओझल हो रहे थे /

समय से अनुरोध

          अशोक  वाजपे यी   की एक कविता से कुछ दिनों का विश्राम   लेना     चाहती हूँ /




समय , मुझे       सिखाओ

कैसे भर जाता है घाव ? - पर
एक  अदृश्य  फाँस  दुखती रहती है
जीवन - भर /

समय, मुझे बताओ
कैसे जब सब भूल चुके होंगे
रोजमर्रा  के जीवन व्यापर में
मैं याद रख सकूँ
और दूसरों से बेहतर न महसूस करूँ /

समय, मुझे सुझाओ
कैसे   मैं अपनी रौशनी  बचाए रखूं
तेल चुक जाने के बाद भी
ताकि वह लड़का
 उधार  ली महँगी किताब एक रात में ही पूरी पढ़ सके /

समय, मुझे सुनाओ वह कहानी
जब व्यर्थ   पड़  चुके हों शब्द ,
अस्वीकार किया  जा चूका हो सच,
और बाकी  न बची हो जूझने की शक्ति
तब भी किसी ने छोड़ा न हो प्रेम
तजी न हो आसक्ति ,
झुठलाया न हो अपना मोह /

समय, सुनाओ  उसकी गाथा
जो अंत तक बिना झुके
बिना  गिड गिड़ाय  या   लड़  खड़ा ए ,
बिना थके और हारे , बिना संगी - साथी ,
बिना अपनी यातना को सबके लिए  गाए ,
अपने अंत की ओर चला गया /

समय , अँधेरे में हाथ थमने ,
सुनसान में गुनगुनाहट  भरने ,
सहारा देने , धीरज  बंधाने ,
अडिग रहने , साथ चलने और लड़ने का
कोई भुला - बिसरा पुराना गीत  तुम्हें याद हो
 तो समय , गाओ
ताकि यह समय ,
यह अँधेरा ,
यह  भारी
यह असह्य समय कटे /   

गुरुवार, 8 नवंबर 2012

 दोस्तों  आज  हिंदी के महत्वपूर्ण  कवि  धूमिल की एक कविता " किस्सा जनतंत्र का" को आपसे साझा कर रही हूँ /

करछुल -
बटलोही से बतियाती है और चिमटा
तवे से मचलता है
चूल्हा कुछ नहीं बोलता
चुपचाप जलता है और जलता रहता है /

औरत
गवें  गवें  उठती है - गगरी में
हाथ डालती है
फिर एक पोटली खोलती है /
उसे कठवत में झाड़ती है /
लेकिन कठवत का पेट भरता ही नहीं
पतरमुही ( पैठान तक नहीं छोड़ती )
सरर फरर बोलती है और बोलती रहती है /

बच्चे आँगन में -
आँगड़ बांगड़  खेलते हैं /
घोडा - हाथी  खेलते हैं
चोर -साव  खेलते हैं
राजा - रानी खेलते हैं और खेलते रहते हैं
चौके में खोई हुई औरत के हाथ
कुछ  भी नहीं देखते
वे केवल रोटी  बेलते हैं और बेलते रहते हैं
एक छोटा - सा जोड़ भाग
गश्त खाती हुई आग के साथ - साथ
चलता है और चलता रहता

बडकू को एक
छोटकू को  आधा
परबत्ती  बाल किशनु  आधे में आधा
कुल रोटी  छै
और तभी  मुँह दुब्बर
दरबे में आता है - खाना तैयार है ?
उसके आगे  थाली आती है
कुल रोटी तीन
खाने से पहले  मुँह दुब्बर
पेट भर
पानी पिता है और लजाता है
कुल रोटी ती न
पहले उसे थाली खाती है
फिर  वह रोटी खता है /

और अब-
पौने दस बजे हैं -
कमरे की हर चीज
एक रटी हुई  रोजमर्रा धुन
दुहराने लगती है
वक्त घडी से निकलकर
अंगुली पर आ जाता है और जूता
पैरों में , एक दन्त टूटी  कंघी
बालों में गाने लगती है
दो आँखें दरवाजा खोलती हैं
दो बच्चे टाटा कहते हैं
एक फटेहाल कलफ कालर -
टांगों में अकड़  भरता है
और खटर - पटर एक  ढढढ़ा  साईकिल
लगभग भागते हुए चेहरे के साथ
दफ्तर  जाने लगती है
सहसा चौरस्ते पर जली लाल बत्ती जब
एक दर्द हौले से  हिरदै को हल गया
' ऐसी क्या हड़बड़ी कि जल्दी में पत्नी को
चूमना
देखो, फिर भूल गया /'







ढोला - मारू की अधूरी कथा

आइये दोस्तों , आज ढोला  मारू की एक आधुनिक लोक कथा सुनाऊं / वैसे तो  मैंने इस ब्लॉग की    शुरुआत   एक बेहतरीन उपन्यास " नई सुबह" से किया था /  पर  आज की कथा  लोक समाज की कथा है /

 मारू हीरापुर गांव में रहती थी  /  एक दिन उस गांव में बहुत खुबसूरत एक परदेसी आया / उसका नाम ढोला था / आते ही ढोला ने गांव वालों का दिल जीत  लिया  / वह बांसुरी बहुत अच्छी  बजाता /  उसकी  बांसुरी के धुन में मारू खोती  चली गई  / धीरे - धीरे ढोला  और  मारू आपस में  प्रेम करने लगे /  प्रेम में पगे जोड़ों की तरह ढोला  और मारू भी प्रेम में जीने और मरने की कसम खाने लगे /  ढोला  अपनी   मारू के लिए सबकुछ  छोड़ने को तैयार था / वह मारू को दुनिया के सारे  सुख देने की कसमें खाने लगा / मारू भी उन कसमों पर भरोसा करने लगी /
पर एक दिन मारू पर  विपत्तियों  का पहाड़ टूट पड़ा  जब उसके सामने सिहलगढ़  की रहने वाली मारवाणी  आ खड़ी हुई /  मारवाणी  ढोला की महारानी  थी / वह ढोला को अपने साथ ले जाने के लिए आई थी /  पर ढोला उस समय लौटने के लिए  तैयार न हुआ  /  मारवाणी  थक कर वापस सिहल गढ़ लौट गई थी / पर मारवाणी के लौटने के बाद  ढोला का मन इस गांव से उखड़ने  लगा  था /  मारू और ढोला  के सम्बन्ध यहीं से बिखरने लगे  थे /  समय गुजरने के साथ  ही ढोला के सपनों में भी तब्दीली आने लगी थी / अब ढोला केवल धन कमाने का ख्वाब देखता / उसे बहुत सारा धन कमाना था / उसे दुनिया को बहुत कुछ दिखाना था / समय के साथ ढोला  बदल गया था या ढोला ऐसा ही था - मारू समझ नहीं पाती / अब ढोला को मारू  के चेहरे  की उदासी बेचैन नहीं  करती थी / वह मारू को दरकिनार करने लगा /  ढोला को अब मारू की कोई भी बात गाली  लगती थी /
वह अब मारवाणी के साथ अपने सुन्दर को लेकर पहाडपुर में बसने का सपना देखने लगा / एक दिन ढोला का सपना पूरा हो  गया / पंखों वाला घोडा  एक दिन  जमीं पर उतर आया / वह  उस घोड़े पर बैठकर अपनी मारवाणी  को लेकर  पहाडपुर चला गया / वह वहां जाकर व्यापर करने लगा / अब उसके पास बहुत सारा धन जमा हो गया था /  बहुत वर्ष बीत गए थे / एक दिन उसे उसे हीरापुर गांव  की बहुत याद  आई और साथ ही मारू की भी याद आई जिसे वह  कभी प्यार करता था और उसे बिना बताये  वह पहाडपुर आ बसा था / पर अब
पहाडपुर से गांव लौटना संभव नहीं था / पहाडपुर की माया ही ऐसी थी / इधर मारू  उसकी प्रतीक्षा  में एक पत्थर के रूप में  बदल चुकी थी /  आज भी हीरापुर गांव में  उस  पत्थर के दर्शन किये जा सकते हैं /

बुधवार, 7 नवंबर 2012

सोमवार, 5 नवंबर 2012

कवि की चिंता (2)

सदी का सबसे बड़ा कवि चिंतित था
किसानों के लिए , आदिवासियों के लिए
दलितों के लिए ,  स्त्रियों के लिए /
वह सोचता
किसानों , आदिवासियों , दलितों  और  स्त्रियों   के बिना
यह पृथ्वी  कैसी होगी ?
पृथ्वी का काम कैसे चलेगा इनके बिना /

फिर धीरे - धीरे वह एक ऐसी
दुनिया  में दाखिल हो जाता
जहाँ जंगल में दुनिया भर के
जुगनू अपनी रौशनी में 
नहा  रहे होतें /

कवि की चिंता

    सदी का सबसे बड़ा कवि चिंतित था
    गाँव   को शहर में बदलता देख
और शहर को धीरे - धीरे मरता देख /

वह चिंतित था
कुछ सवालों से
जो आये दिन
उसकी पेशानी  पर
यकायक उभर आते थे
चैनलों की  बाढ़  में उसे
अपना देश जुगाली करता  दिखता  /

उसके सपनों में आते
बुजुर्गियत  ओढ़े   बच्चे  ,
नंगी औरतें ,
आधुनिकता  को ढोल की तरह
लटकाए युवा
और वह आम आदमी भी
जो गाँधी की टोपी की मानिंद
इधर से उधर उछाला जा रहा था  /

आम आदमी का मुहावरा
कवि  के चेहरे को नमकीन बना रहा था /
इस मुहावरे  के जरिए  वह दाखिल हो रहा था
एक  ऐसी तिलस्मी  दुनिया में
जहाँ पुरस्कारों के लिए
उसकी पीढ़ी  के कवि
कोरस में मर्सिया पढ़ रहे थे /







रविवार, 4 नवंबर 2012

सवाल

वन में अकेली बैठी सीता
सोच रही थी
राम के निर्वासन में बदा था
मेरा भी निर्वासन /
पर मेरे  निर्वासन में
राम कहां  हैं ?

राम ,  राजा राम तो बन गएं
पर पति की आस्था कहां रख पाएं  ?
साथ चलने की शपथ मैंने निभाई
परन्तु राम के जेहन में
केवल धोबी की छवि आई /

राम , तुम धन्य हुए
पर सीता से छिन्न भी हुए/    

शुक्रवार, 2 नवंबर 2012

कल  करवा  चौथ था /  दाम्पत्य  प्रेम के बंधन को आस्था के डोर से बाँधने वाला व्रत / हम औरतें  अपने पतियों या प्रिय के लिए , उसके सुख - समृधि  के लिए , उसकी आरोग्यता के लिए      निर्जला  उपवास रखतीं हैं / हम तो अपना सारा जीवन अपने पतियों के लिए वारती  हैं/पर बहुत  कम पति इस बात को समझ पाते  हैं /  हम औरतें भी अजीब हैं / किसी  को अपना मान लिया तो बस मान लिया और वह लाख चाहे उसकी परवाह न करता हो पर इससे  हम पर कोई फर्क नहीं पड़ता /  हम औरतें  इस मायने में बहुत मजबूत और  दृढ होती हैं / कल  का दिन हमारे प्रेम के परीक्षा का भी था / मैंने तो अपना फर्ज निभाया /  सारा दिन  चाँद के प्रेम में उपवास रखा / उसकी प्रतीक्षा करते - करते  रात के साढ़े आठ बज गए / तब जाकर चाँद देवता मुस्कराते हुए उदित हुए / चाँद देवता  ही तो आज के दिन आराध्य  होते हैं / दूर आकाश में बादलों की ओट में छिपे आखिरकार चाँद देवता अपनी  आराध्याओं   पर  प्रसन्न  होकर  सामने आये /  चाँद देवता ने तो अपनी टेक निभाई  पर .........../  आस्था , विश्वास , प्रेम , ......... मिट नहीं सकते / इस व्रत की यही तो महिमा है /  हमारी संस्कृति  यही सिखाती है /  आस्था रखो / इससे बड़ा बल कोई नहीं है/               

बुधवार, 31 अक्तूबर 2012


मैं अपने उस गांव में लौट जाना चाहती हूं जहां मैं अपना बचपन चालीस साल पहले छॊड. आई थी/अपने गांव जाकर मैं उसकी गॊद में मरना चाहती हूं/ अपने निर्वासन की लंबी थका देने वाली यात्रा कॊ उस मांझी के पुल के तले  खत्म करना चाहती हूं जॊ मेरे बचपन का सबसे बडा अजूबा था/बाबा और आजी का हाथ पकडे उस पुल से गुजरना मानॊ एक सदी की यात्रा करना था/बाबा और आजी उस समय मेरे लिये मेरे प्राण थे/ उनसे ही मेरी सारी दुनिया थी/ उस दुनिया में मेरे घर का माटी का आंगन महकता था, महुआ का मठिया वाला पेड़ गमकता था और वह मिल्की का आमॊं का बागीचा हमें सम्मॊहित कियॆ रखता था/ बाबा के साथ भरी दुपहरी खेतॊं में मन का रमना, आजी के साथ गंगा मईया में नहाना और सती मईया की पूजा के लिये मीलॊं पैदल चलती गांव भर की दादी- आजी की टॊलियॊं में अपनी आजी की डॊलची पकडे.पैदल चलना और जब चलते चलते गॊर दुखा गय़े तॊ आजी की गॊदी एकमात्र सहारा/


अपनी आजी कॊ याद करते हुए आंखें भर आती हैं /  मेरी आजी हिन्दुस्तान की उन औरतों की याद दिलाती  हैं जिनका सारा जीवन अभाव से अभिशापित होता है , संघर्ष करते करते जिनकी पूरी जिन्दगी कट जाती है, एक टुकडा़  सुख के लिये वे सारी उम्र रास्ता  जॊहती रहती हैं पर सबसे सुकून देने वाली बात यह हॊती है कि हिन्दुस्तान की ये औरतें कभी हिम्मत नहीं हारतीं/ चेहरे पर एक मासूम- सी हंसी जो इन्हें जीवटता प्रदान    करती है/ हम इन औरतॊं से कितना कुछ सीख सकते हैं/ मेरी आजी जिनके पास पूंजी के नाम पर केवल एक छोटा सा बक्सा था और आजी का वह बक्सा हमारे लिये एक जादुई पिटारा था/ आजी से हम जिद करते कि वे अपना बक्सा खॊलें/ उस बक्से में आजी की अपनी चीजॊं के नाम पर केवल एक जिउतिया रहती थी, कपडॊं के कुछ टुकड़े, कुछ पोटलियां/ बस उस बक्से की यही दुनिया थी / उस बक्से में आजी कभी ताला नहीं लगाती थीं/ आजी व्रत , उपवास ,पूजा- पाठ बहुत करती थीं/ इसका कारण यह नहीं था कि वे  धर्म भीरू महिला थीं बल्कि घर के अभाव से बचने का यह सुगम रास्ता था तथा अपनी संतानॊं की सुखद कामना के लिये उपासना की शरण में जाने से बेहतर रास्ता और कॊई था भी नहीं/ निर्जला उपवास तॊ उनकी दिन चर्या में शामिल था/ सारे देवताऒं कॊ वे पूजतीं/ पता नहीं कौन- से देवता उनकी पूजा से खुश हॊकर उनकी संतानॊं कॊ अपना आशीश दे दें/ 

सोमवार, 15 अक्तूबर 2012

दागदार चेहरे


   अपने हिस्से जिंदगी की धूप
थोड़ा ज़्यादा ही आई
इस धूप में साथ सबने छोड़ दिया था
सबके अपने तर्क थे
कुछेक मजबूरियों की शरण में गये थे
कुछ एक ने तीसरे पक्ष को थामा था
कुछ समय के साथ अपने रंग बदल लिए थे
धूप ने सबके मुखौटे उतार दिए थे
चेहरे जो पहले उजले थे
अब दागदार नज़र आ रहे थे /  

ई . मेल


बरसों बाद बेटे ने
ई. मेल किया है अमेरिका से
खोज खबर ली है
हाल- चाल पूछा है हमारा /
बाप बनकर  उसे याद आया है
उसके भी बाप अभी जिंदा हैं
माँ की सख़्त ज़रूरत है
बच्चा अभी छोटा है
बीबी की  तीमारदारी के लिए
माँ का ख्याल आया है /
बरसों बाद बेटे का ई. मेल . आया है/


सोमवार, 1 अक्तूबर 2012

दावा

 मैं उसे उस राह  पर छोड़ आया था
जहाँ से आगे जाने के सारे रास्ते बंद थे
मैंने उससे प्यार किया था
मेरी अपनी कुछ मजबूरियां थीं
कमजोरियां थीं
मैं लौट आया था स्वजनों के नेह में
उसे वीराने में छोड़
तन्हाइयों  के साथ रोने  व  सिसकने  के लिए
दोस्तों, आज  भी मैं दावा करता हूँ
मैंने उससे प्यार किया था /

पुरखों का घर बेचकर
वे जा चुके थे....
अमरूद का पेड़
चुपचाप वहाँ खड़ा था
उसे कहीं नहीं जाना था
अपनी ज़मीन से उखड़ना
उसे मंजूर नहीं था /

शुक्रवार, 11 मई 2012

हमने प्रेम किया था

अपने - अपने हिस्से के दुःख में मगन रहें  हम /
कभी मौका ही न मिला 
एक दूसरे  के दुःख से मिलने का 
बतियाने का ,
जानने का , समझने का /
हम दोनों दावा करते रहे ताउम्र 
कि  हम अकेले हैं 
पर हमें से कोई भी अकेला नहीं था /
हम दोनों के साथ था 
हमारा दुःख , हमारा सन्नाटा ,
हमारा बीहड़ एकांत 
यही तो  थे हमारे  प्रेम करने के गवाह/
प्रेम में हमने इन्हें ही तो पाया  था 
यह जानते हुए भी कि 
प्रेम अकेलेपन का ही  पर्याय है
 दुःख का   दूसरा नाम प्रेम ही तो है 
प्रेम में निरंतर अकेले हो जाना 
ही तो हमारे प्रेम की उपलब्धि थी/ 
एकांत का बीहड़पन ही तो 
हमने पाया था अपने प्रेम में 
जिसमें हम ताउम्र भटकते रहे 
हमने  प्रेम  किया था ...... 

मंगलवार, 28 फ़रवरी 2012

बंद की राजनीति बंद हो !

बंद ... बंद ..... कल फिर से एक बंद का चेहरा बंगाल को देखना पड़ा /  पता नहीं  बंगाल कब इस बंद के कल्चर से उबरेगा ? यहाँ बंद के नाम पर जिस प्रकार की राजनीति की जाती है वह अपने आप में बेहद खतरनाक भी है और बेहद उबाऊ भी है / हड़ताल  और बंद के जरिए पता नहीं किन मुद्दों  को सुलझाया  जाता है  , यह मुझे आज तक  समझ में  नहीं आया है /  ममता की सरकार ने इसे अपनी प्रतिष्ठा का सवाल बना दिया  और सरकार की तरफ से जो कदम उठाने चाहिए थे उसने उठाया /सरकारी  गाड़ियाँ दौड़तीं रहीं वीरान सड़कों पर / रेल गाड़ियाँ पटरिओं पर समय पर चलती रहीं / पर बंगाल की जनता  सड़कों पर नहीं निकली क्योंकि वह  बंद  को एक छुट्टी के तौर पर लेती है / जो लोग सड़कों पर दिखे या अपने - अपने  दफ्तरों  में  दिखे , वे सभी सरकारी कर्मचारी थे जिनमें ९०% अपनी सर्विसे या नौकरी बचाने आये थे  क्योंकि सरकार की तरफ से बाकायदा धमकी दी गई थी या कड़ा निर्देश दिया गया था कि जो नहीं आयेंगे उन्हें देखा जायेगा / यह सरकार की एक सफल  रण नीति थी जो कारगर भी सिद्ध हुई /
एक सवाल यह भी उठता है कि आने वाले दिनों में हमें अपने विरोध और मांगों के लिए बंद के अलावा अन्य  विकल्पों  की तलाश किस दिशा में करनी होगी ? अब सारे राजनीतिक दलों को इस दिशा में अपने सरे मतविरोधों को दरकिनार करके सोचना पड़ेगा  /

शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2012

मुक्ति 

उसने मुझसे  कहा-
मैं तुम्हें  मुक्त करती हूँ
अपने रिश्तों से ,
अपनी  चिंताओं  से
अपने प्यार से /

सोचता हूँ
मुक्त करना
क्या सचमुच मुक्त करना होता है ?
kabhi  मुक्तिबोध ने कहा था
मुक्ति कभी अकेले की नहीं होती /
 इसलिए कहाँ  हो पाते  हैं  हम मुक्त ?

हम- तुम एक दूसरे से
अलग होकर
अलग -अलग   दिशाओं  में
मुक्ति की तलाश करते रहे
और
एक दूसरे को मुक्त करने का
स्वांग  भरते रहे /
पर जितना भी स्वांग  भरे
मुक्त होना संभव  नहीं है
क्योंकि
रिश्तों से, चिंताओं से , प्यार से
मुक्त होना
शायद  हमारे मरने  की
निशानी होगी /

मुक्ति

उसने मुझसे  कहा-
मैं तुम्हें  मुक्त करती हूँ
अपने रिश्तों से ,
अपनी  चिंताओं  से
अपने प्यार से /

सोचता हूँ
मुक्त करना
क्या सचमुच मुक्त करना होता है ?
लाभी मुक्तिबोध ने कहा था
मुक्ति कभी अकेले की नहीं होती /
 इसलिए कहाँ  हो पाते  हैं  हम मुक्त ?

हम- तुम एक दूसरे से
अलग होकर
अलग -अलग   दिशाओं  में
मुक्ति की तलाश करते रहे
और
एक दूसरे को मुक्त करने का
स्वांग  भरते रहे /
पर जितना भी स्वांग  भरे
मुक्त होना संभव  नहीं है
क्योंकि
रिश्तों से, चिंताओं से , प्यार से
मुक्त होना
शायद  हमारे मरने  की
निशानी होगी /

शनिवार, 11 फ़रवरी 2012

कविता पढ़ते हुए

न जाने क्यूँ मैं कविता पढ़ते हुए 
उदास हो जाता हूँ ?
कविता की दुनिया में 
मेरे हिस्से का दुःख 
अक्सर खड़ा मिल जाता है /
अपने सन्नाटे से बचने के लिए 
मैं कविता की दुनिया में दाखिल 
होता हूँ पर वहां वह सन्नाटा 
भी अकेलेपन की चादर  ओढ़े 
खड़ा रहता है मेरे इंतज़ार में /
पता नहीं कविता में इतना दुःख 
किसने लाकर चुपके से रख दिया है 
और अकेलापन   लुकाछिपी 
खेलते हुए आ दुबका है 
कविता की  ओट में किसी  बच्चे  की तरह/
कभी हमने रचा था कविता को 
अपने दुःख से बचने के लिए 
सन्नाटे के बीहड़पन से 
उबरने के लिए 
पर पता नहीं क्यों ?
मुझे लगता है
 शायद दुःख और सन्नाटे से 
बचना मनुष्य की सबसे 
नासमझ चेष्टा है/ 

अधेड़ होती स्त्री

अधेड़ होती स्त्री 
अब अपने बारे में ज्यादा नहीं सोचती 
सोचना उसने अब बंद कर दिया है /
चुपचाप धीमे - धीमे वह 
सबकुछ स्वीकारती चली जा रही है 
जानती है वह
 कि अब वह धीरे- धीरे चुक रही है /
अब वह अपने बारे में ज्यादा नहीं सोचती  
सोचना उसने अब बंद कर दिया है /
खुला रहता है उसके घर का दरवाजा 
पर बंद रहता है उसके मन का किवाड़ 
उसे पता है  कि
लोग भी अब उसके बारे में नहीं सोचते /
वह कटती जाती है अपने आस- पास से 
अधेड़ होती स्त्री 
घिरती जाती है 
एक सन्नाटे में 
जो उसका अपना होकर भी 
उसका नहीं होता/
वह बिनती रहती है 
कुछ लम्हों को , कुछ पलों को 
स्मृतियों की पुरानी पड़ती जा रही कोटर से
कुछ चेहरों को झाड़ती-   पोंछती    रहती है 
वापस सहेज कर रखने के लिए /
अधेड़ होती स्त्री 
अब अपने बारे में ज्यादा नहीं सोचती / 

रविवार, 8 जनवरी 2012

विजयदेव नारायण साही की अंतिम काव्य कृति " साखी  " की अंतिम कविता " प्रार्थना : गुरु कबीरदास के लिए " से कुछ पंक्तियां ---

दो तो ऐसी निरीहता  दो
कि इस दहाड़ते  आतंक के बीच
फटकार कर सच बोल सकूँ
और इसकी चिंता न  हो
कि   इस बहुमुखी युद्ध में
मेरे सच का इस्तेमाल
कौन अपने पक्ष में करेगा ?
.................
यह भी न दो
तो इतना ही दो
कि बिना मरे चुप रह सकूँ / 

प्रार्थना : गुरु कबीरदास के लिए - विजयदेव नारायण साही

दोस्तों , इस कविता की कुछ पंक्तियाँ .......


दो तो ऐसी निरीहता दो
 कि इस दहाड़ते  आतंक के बीच
फटकार  कर सच बोल सकूँ
और इसकी चिंता न हो
कि इस बहुमुखी युद्ध  में
मेरे सच का इस्तेमाल
कौन अपने पक्ष  में करेगा /

.....................

यह भी न दो
तो इतना ही दो
कि बिना मरे चुप रह सकूँ /