गुरुवार, 8 नवंबर 2012

ढोला - मारू की अधूरी कथा

आइये दोस्तों , आज ढोला  मारू की एक आधुनिक लोक कथा सुनाऊं / वैसे तो  मैंने इस ब्लॉग की    शुरुआत   एक बेहतरीन उपन्यास " नई सुबह" से किया था /  पर  आज की कथा  लोक समाज की कथा है /

 मारू हीरापुर गांव में रहती थी  /  एक दिन उस गांव में बहुत खुबसूरत एक परदेसी आया / उसका नाम ढोला था / आते ही ढोला ने गांव वालों का दिल जीत  लिया  / वह बांसुरी बहुत अच्छी  बजाता /  उसकी  बांसुरी के धुन में मारू खोती  चली गई  / धीरे - धीरे ढोला  और  मारू आपस में  प्रेम करने लगे /  प्रेम में पगे जोड़ों की तरह ढोला  और मारू भी प्रेम में जीने और मरने की कसम खाने लगे /  ढोला  अपनी   मारू के लिए सबकुछ  छोड़ने को तैयार था / वह मारू को दुनिया के सारे  सुख देने की कसमें खाने लगा / मारू भी उन कसमों पर भरोसा करने लगी /
पर एक दिन मारू पर  विपत्तियों  का पहाड़ टूट पड़ा  जब उसके सामने सिहलगढ़  की रहने वाली मारवाणी  आ खड़ी हुई /  मारवाणी  ढोला की महारानी  थी / वह ढोला को अपने साथ ले जाने के लिए आई थी /  पर ढोला उस समय लौटने के लिए  तैयार न हुआ  /  मारवाणी  थक कर वापस सिहल गढ़ लौट गई थी / पर मारवाणी के लौटने के बाद  ढोला का मन इस गांव से उखड़ने  लगा  था /  मारू और ढोला  के सम्बन्ध यहीं से बिखरने लगे  थे /  समय गुजरने के साथ  ही ढोला के सपनों में भी तब्दीली आने लगी थी / अब ढोला केवल धन कमाने का ख्वाब देखता / उसे बहुत सारा धन कमाना था / उसे दुनिया को बहुत कुछ दिखाना था / समय के साथ ढोला  बदल गया था या ढोला ऐसा ही था - मारू समझ नहीं पाती / अब ढोला को मारू  के चेहरे  की उदासी बेचैन नहीं  करती थी / वह मारू को दरकिनार करने लगा /  ढोला को अब मारू की कोई भी बात गाली  लगती थी /
वह अब मारवाणी के साथ अपने सुन्दर को लेकर पहाडपुर में बसने का सपना देखने लगा / एक दिन ढोला का सपना पूरा हो  गया / पंखों वाला घोडा  एक दिन  जमीं पर उतर आया / वह  उस घोड़े पर बैठकर अपनी मारवाणी  को लेकर  पहाडपुर चला गया / वह वहां जाकर व्यापर करने लगा / अब उसके पास बहुत सारा धन जमा हो गया था /  बहुत वर्ष बीत गए थे / एक दिन उसे उसे हीरापुर गांव  की बहुत याद  आई और साथ ही मारू की भी याद आई जिसे वह  कभी प्यार करता था और उसे बिना बताये  वह पहाडपुर आ बसा था / पर अब
पहाडपुर से गांव लौटना संभव नहीं था / पहाडपुर की माया ही ऐसी थी / इधर मारू  उसकी प्रतीक्षा  में एक पत्थर के रूप में  बदल चुकी थी /  आज भी हीरापुर गांव में  उस  पत्थर के दर्शन किये जा सकते हैं /

2 टिप्‍पणियां:

  1. kahani achhi hai maru es desh ki we aurate hai jishe desh pujta hai aur fakra karta hai dhola ek bhendia ka pratik hai jo apni dukh ka rona rokar dushro ko thagta hai koi aur nahi to bhagwan use saja dete hai pata nahi we pathar nahi par kisi par kisi jhopri ke barsat ko rokne me sad jate hai.Dhanyabad bahut aachha likhti hai jari rakhe

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    1. Bahut dino bad ek aachhi kahani mili praysh jari rakhe pathko ko nirash mat kare agle kahani ki pratiksha me namaskar

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