बुधवार, 3 फ़रवरी 2016

हर दिन यूँ ही बीत जा रहा है । दिनों का यूँ ही बीत जाना कितना कष्टदायक है । पर चाहकर भी इन दिनों को यूँ ही बीतते  हुए मैं नहीं रोक सकती । दिनों को बीतते  हुए देखकर लगता है कि ऐसे ही हम बिना वजह  बीतते  जाते हैं और एक दिन चलने का वक्त आ जाता है । सबकुछ पीछे छोड़कर एकदम से चल  पड़ना पड़ता  है । पीछे छूटे हुए लोग कितने पीछे छूट  जाते हैं। ..... और हम यात्राओं की फेहरिस्त में शामिल हो जाते हैं । ये यात्राएं  हमें कहाँ ले जाती हैं  और कहाँ जाकर छोड़ देती हैं .... कुछ समझ में नहीं आता । कभी - कभी लगता है कि इन यात्राओं में हम हर मोड़ पर , हर पड़ाव पर अपना थोड़ा थोड़ा कुछ सौंपते चले जाते हैं , हमारे अंदर का थोड़ा थोड़ा कुछ  पीछे छूट ही जाता है ।   सबकुछ समेट  कर चलना बड़ा मुश्किल होता है । समेटना  चाहते हो  पर कहाँ समेटोगे  ... हाथों में । हाथों को   अंजुरी बनाकर कभी देखना । कितना संभाल  पाते हो और कितना कुछ बिखर जाता है । मन में , ह्रदय में , आत्मा में  समेटने की बात सोच  रहे हो । पर ये  भी कहाँ साथ देते हैं। ......ये . सब अपनी अपनी  मन की करते हैं ।मन , प्राण ये भी नहीं सँभालते । अगर ये संभाल लेते तो फिर  इस संसार  में इतना दुःख क्योँ होता। .. 

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