शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2014

मेरी बहस जारी है ....

दरख़्त   अंधेरे में  मौन खड़े थे
किसी बात को लेकर
शायद
 वे  लंबी बहस के बाद
सुस्ता रहे थे
या
उदास थे
या विचार  मग्न थे
कह नहीं सकता
क्यूँ कि
मैं भी एक लंबी बहस के बाद 
बेहद अकेला था / 

बहस ..... 
मैं घंटों बहस करता था 
बरसते पानी पर 
गुम होते मासूम बच्चों पर 
लुप्त होते बाघों पर
कटते  जंगलों पर  /

ईमानदारी , भ्रष्‍टाचार , देशसमाज , मान -प्रतिष्ठा 
 जाने कितने भारी - भरकम 
शब्दों से मैं रोज खेलता /
मैं इन शब्दों में 
अपने आपको छुपाता
कहीं  कहीं 
ये मेरे लिए 
मेरे जीने का उपक्रम थे /




बहस के बाद 
जब मैं बेहद एकांत हो जाता 
तब लौटता 
अपने आप के पास 
जहाँ मैं 
एक निरीह बच्चे की तरह 
सुबक कर रोता /
और अपनी ग़लतियों के लिए 
उससे माफी माँगता 
जो अब 
मुझे माफ़ करके जा चुकी थी  / 




मेरी बहस जारी है ....
इन दरखतों की तरह 
मैं भी अपने अंधेरे से लड़ रहा हूँ ..../




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