रविवार, 27 नवंबर 2011

अदना आदमी की चिंता

कहते हैं समय बड़ा बलवान होता है
पर उसकी लड़ाई मेरे जैसे अदने
आदमी से क्यों है ?
मैं तो उसे  चुनौती नहीं देता
और न ही उसको ललकारता हूँ
न ही देता हूँ देख लेने की धमकी
मैं तो चुपचाप सिर झुकाए
निकल आता हूँ उसके
सामने से /

जनता हूँ
समय से मुठभेड़ करना
मेरे जैसे अदने आदमी को
शोभा नहीं देता
पर समय
वह कहाँ छोड़ता है मुझे

ला पटकता है
 स्मृतियों के घने बीहड़ वन में
जहाँ   अतीत के फडफडाते इतिहास के
   पक्षी
बेचैन होकर
अपने डैने खोलते हैं /

मैं अदना -सा  आदमी हूँ
वर्तमान में जीता  और मरता हूँ
बहसों , संवादों
से दूर भागता हूँ
जनता हूँ
आज
ये मात्र खोखले शब्द बन चुके हैं /
जिनके पेट भरे हैं
दिमाग भरे हैं
ज्ञान और सूचनाओं से
 जो दूसरों को आतंकित करते हैं
वे प्रबुद्ध जन
जो  इन्तेक्चुअल्स का टैग  लगाये
समय के बाजार में बिक रहे हैं
जो बहस और संवाद के शोर में
नगाड़ा  बजा रहे हैं
उनकी चिंता की  लकीरें बस
टेलीविजन  के परदे पर दिखती हैं /

मैं भाग रहा हूँ
या
भगाया जा रहा हूँ  उनके द्वारा
कौन जनता है
समय कब मेरे सामने खड़ा हो जावे
और
मैं चुपचाप सिर  झुकाए
उसके सामने से निकल  आऊं  

3 टिप्‍पणियां:

  1. अदना आदमी कभी-कभी बहुतों पर भारी पड़ जाता है।

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  2. जनता हूँ
    समय से मुठभेड़ करना
    मेरे जैसे अदने आदमी को
    शोभा नहीं देता
    पर समय
    वह कहाँ छोड़ता है मुझे

    बहुत सुंदर प्रस्तुति । धन्यवाद ।

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