बुधवार, 12 अक्तूबर 2011

आडवाणी के रथयात्रा के मायने

  आडवाणी जी रथयात्रा पर निकल चुके हैं / पर सोचनेवाली बात यह है कि इससे बीजेपी को कितना  फायदा  होगा / वैसे भी बीजेपी के पास कोई मजबूत अजेंडा नहीं है /वह देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी तो है पर उसकी भूमिका उतनी दमदार नहीं है / इस पार्टी में कोई ऐसा नेता नहीं है जिसे सर्वसम्मति से सब स्वीकार कर सके / आडवाणी जी खुद अपने आपको कभी-कभार  प्रधानमंत्री के रूप में  प्रोमोट करते रहते हैं पर अक्सर उनके इस  प्रोमोशंन पर हल्ला मचता रहता है / इस दौड़ में मोदी भी दौड़ रहे हैं तो गडकरी भी लगे हाथ इसमें शामिल हो जा रहे हैं /   आडवाणी जी रथयात्रा के पीछे अपनी और अपनी पार्टी की यह मंशा बता रहे हैं कि इससे भ्रष्टाचार  को खतम करने में मदद मिलेगी और जनता  कांग्रेस के खिलाफ लामबंद होगी /  पर इस रथयात्रा से कोई फरक नहीं पड़ने वाला है / हाँ , बीजेपी के कार्यकर्ताओं में एक जोश जागेगा / 

4 टिप्‍पणियां:

  1. अब देखिए हर चीज़ में एक गुड होता है। कोयलवर के पुल के नीचे जब रथ फंसा तो यह तो सबके दिमाग में आया ही होगा की रथ की ऊंचाई अगली यात्रा में छोटी रखनी होगी।

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  2. यह अच्छा नहीं होता कि आडवाणी जी रथयात्रा के बदले पदयात्रा करते / इससे उन्हें देश को और मतदाताओं को समझने में आसानी होती और उनकी छवि भी निखरती / रथयात्रा के तामझाम को देखते हुए बहुत सारी बातें हजम नहीं हो पा रही हैं /

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  3. रतयात्रा के नाम पर तामझाम का महत्व यदि राजनीति के सही पैमाने पर देखा जाए तो बात स्पष्ट रूप से निखर कर सामने आती है कि भारतीय जनता पार्टी को अगले लोक सभा के निर्वाचन में जीत दिलाना है । राहुल गांधी जी उत्तर प्रदेश में किस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए पदयात्रा किए थे .!
    धन्यवाद ।

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  4. अगर तामझाम से लोकसभा का चुनाव जीत लिया जाता तो इन नेताओं के लिए कोई परेशानी की बात ही नही होती / तामझाम से चुनाव जीता नही जा सकता / चुनाव में जीत हासिल करने के लिए जनता के नब्ज़ की सही पहचान होनी चाहिए / जहाँ तक आडवाणी जी और राहुल की यात्राओं की बात है तो आडवाणी जी की तुलना में राहुल जी जो कर रहे हैं उससे जनता को एक हद तक अपनी ओर खिंचा जा सकता है पर सब समय यह फंडा काम नही करता है /

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