रविवार, 19 जून 2011

पिता की स्मृति में

         तुम बार बार याद आए 

लड़ते लड़ते जब जब कदम लड़खड़ाए
तुम ही याद आये 

 तुम्हारा  वह मौन  त्याग  
वह गला देने वाला संघर्ष

 जीवट को कलेजे से  लगाये
तुम अपना जीवन वारते रहे हम पर 

और एक दिन तुम्हारा 
 चुपके से ऐसे चले जाना

मानो  ..............

जैसे कोई जीवन रीत गया हो  /

तुम सहेजते रहे  हमें
और हम
 तुम्हें अकेलेपन की ओर धकेलते रहे

तुमने हमें  स्वीकारा
और
हम तुमसे आजीवन असहमत  होते रहे /

तुम हमारे पिता थे 
जीवन का सारा पाठ तुम्हारी 
आँखों से पढ़ा था हमने 
सारी राहें तो तुमने हमारे लिये बनाई थी   
तुम्हारी हथेली पकड़कर हमने चलना सीखा था 

पर जब हम तेज दौड़ने लगे 
मेरे पिता तब तुम बहुत पीछे छूट गए थे  /

हम नए थे और तुम पुराने पड़ते जा रहे थे
हमें बहुत कुछ पाना था और  तुम्हें बहुत कुछ सहेजना था

इस पाने और सहेजने में तुम और हम
तुम और हम में ..............
जीवन ही रीत गया
जीवन ही बीत गया

तुम बार बार  याद आये /

3 टिप्‍पणियां:

  1. maám bht schha anubhav hai... aisa lgta hai hr kisi k mn may ye bat hoti hai bs byan krne k ly shabd nai mil pate!!!!!

    aapke anubhav se bht kuch sikhne ko milta hai maám:)

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  2. maám bht schha anubhav hai... aisa lgta hai hr kisi k mn may ye bat hoti hai bs byan krne k ly shabd nai mil pate!!!!!

    aapke anubhav se bht kuch sikhne ko milta hai maám:)jindagi ki kuch mushkil raahein aasan lgne lgti hai:)

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  3. भावुक कर देने वाली कविता है.पढ़कर आँखे भर आयीं.

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