धुन्धवाए हुए आसमान से
धूसर शाम चुपके से उतर आती है
मेरे उंघ रहे कमरे में ...
और उसके साथ उतरता है
एक गहन अंधेरा
मेरे मन में /
यह अंधेरा मेरा अपना है
सौपा है इसे "
उस "
ने
जो उजालों की रहनुमाई में
रंगबिरंगी तितलियाँ उड़ाया करता था /
इस अंधेरे में
खुलते हैं स्मृतियों के बंद झरोखें
जुगनुओं से चमक उठते हैं
कुछ सोए हुए दुख ....
और मैं सारी रात
भींग रहा होता हूँ
अपने दुख की बारिश में /
ऐ मेरे मौला .....
कहाँ सोया है तू ....
मुझे भी दे ऐसी नींद
कि उठ न पाउँ
किसी की पुकार पर/
जाग मेरे मौला .....
थक चुका मैं ...
उठ अब
फरियाद सुन ...
मुझे भी दे ऐसी नींद
कि उठ न पाउँ
किसी की पुकार पर/
अब खत - किताबत बंद कर दो
मेरा पता बदलने वाला है /
अंत हो चुके हैं दुनिया के मसलह त
मैं अपने मसलह त से जा रहा हूँ /
मेरी निशानियों में मुझे खोजने की कोशिश न करना
कुछ निशानियाँ मैं छुपाकर अपने साथ लिए जा रहा हूँ /
यह नहीं कि मिट जाएँगे सब गम तुम्हारे
कुछ गम तुम्हारे मैं अपने सीने में लिए जा रहा हूँ /
.
वी. पी . सिंह की नजमें
हमारे बाबूजी ....
रिटायर हो चुके हैं ......
हमने भी उनको
घर का एक कोना दे दिया है
जहाँ
एक सामान की तरह पड़े रहना है उन्हें /
बाबूजी ....
हमारे घर की नींव थे
पर आज
हमें अपने कांगूरों से प्यार है /
हमने उन्हें अपनी दुनिया से बेदखल कर दिया है
सौंपा है उन्हें एकांत
जहाँ केवल धुन्ध है
चेहरों पर/
और
उदासी के साथ
अपने चूकने की पीड़ा भी है /
अब अक्सर
वे दूर तक निकल जाते हैं
जहाँ हमारी हँसी की खिलखिलाहटें
नहीं पहुँच पातीं /
कहीं दूर से लौटते हुए बाबूजी
सूनी निगाहों से
टटोलते हैं
अपनों के चेहरों पर
थोड़ी - सी मिठास
और थोड़ा - सा नमक /
दूर से थैला लटकाए एक डाकिया आता है
मुठ्ठी भर मुस्कान के साथ
घर - आँगन
बेसब्री से दुआर तक आ जाते हैं /
बबुआ की चिट्ठी
आई है
खैर - खबर तो ठीक है
पर इस बार भी
आना नहीं हो पाएगा ....
काम का बोझ ज़्यादा है
रुपया के लिए हाड़ गलाना पड़ता है
परदेश में
सब कुछ भुलाना पड़ता है
आदमी आदमी नहीं रह जाता
बस एक इंतजार रह जाता है
अगली बार आउँगा
भरोसा दिलाया है /
चिट्ठी के साथ
उ त रती है
उदासी की एक शाम
और
आँगन में बैठी गौरय्या
फुर्र से उड़ जाती है
परबतिया जांत पर
दुख का एक राग छेड़ देती है ....
चुपके से तारे....
उ तर आते हैं चूल्हे के पास
और चाँद
आँगन में बैठा उंघने लगता है
चिठ्ठी आई है ....
आश्वस्त हूँ
इस पृथ्वी पर
कहीं कोई मेरा इंतजार नहीं कर रहा होगा /
न खुले रखे होंगे
किसी ने दरवाजे....
न किसी हल्के आहट पर
कोई पीछे मुड़कर
मेरे लिए देख रहा होगा /
न कोई चिट्ठी आएगी मेरे नाम
न मुंडेर पर रखा जाएगा
मेरे नाम का दीया ....
धीरे - धीरे झड़ता जाउँगा
बुरादे की तरह ....
तुम्हारी स्मृतियों से
और एक दिन
लौट जा उँगा
अपनी माटी के पास/
आश्वस्त हूँ
कहीं कोई मेरा इंतजार नहीं कर रहा होगा /
सूरज पहाड़ की ढलान से उतर रहा है
शायद एक नये घर की तलाश में
वह भी मेरी ही तरह
बड़ी जल्दी में है .....
मुझे भी जाना है
कुछ सामान समेटना है
कुछेक को यूँ ही छोड़ जाना है
सोचता हूँ ...
जिंदगी की पोटली से
दुख के उन चेहरों को
साथ ले लूँ ...
जिनसे मैं न्याय नहीं कर पाया
भागता रहा
पीछा छुड़ाता रहा /
अपनी बेवफ़ाइयों पर रंज है मुझे
मेरे कमजोर कंधे
उठा नहीं सके थे
मेरे झूठे वादों का बोझ
जिन्हें मैं लाद आया था
उन मासूम चेहरों पर
जो पीछे छूट गये थे
अकेले
लगातार
शून्य से
शून्यतर होने के लिए /
मैं शून्य नहीं बनना चाहता था
मुझे वह नीला आकाश चाहिए था
जहाँ तोतों का झुंड
इंद्रधनुष रचता है /
मेरे पास पूरी पृथ्वी थी
जो शिद्दत से
मेरे अपने होने का प्रमाण दे रही थी
चुटकी भर सिंदूर और बिछुए में
मुझे बचाए हुए थी
और अपने प्रेम को भी /
पृथ्वी और आकाश
मेरी जीवन यात्रा के यही तो धुरी थे
जिनमें मैं ता उम्र
किसी ग्रह की तरह चक्कर काटता रहा /
कभी सोचा ही नहीं
उन चेहरों के बारे में
जिन्हें मैं
आहिल्या की तरह शापित कर आया था
जो मेरी शर्तों पर
हार गये थे अपनी जिंदगी की बाजी /
कोई अजन्मा ही रह गया था
ताकि मैं जिंदा रह सकूँ
अपनी पृथ्वी के साथ
अपने आकाश के साथ /
सूरज जा चुका है
शायद उसे नया घर मिल गया होगा
मैं भी चलूं
शायद
मेरा भी नया घर कहीं इंतजार कर रहा होगा /