शुक्रवार, 11 मई 2012

हमने प्रेम किया था

अपने - अपने हिस्से के दुःख में मगन रहें  हम /
कभी मौका ही न मिला 
एक दूसरे  के दुःख से मिलने का 
बतियाने का ,
जानने का , समझने का /
हम दोनों दावा करते रहे ताउम्र 
कि  हम अकेले हैं 
पर हमें से कोई भी अकेला नहीं था /
हम दोनों के साथ था 
हमारा दुःख , हमारा सन्नाटा ,
हमारा बीहड़ एकांत 
यही तो  थे हमारे  प्रेम करने के गवाह/
प्रेम में हमने इन्हें ही तो पाया  था 
यह जानते हुए भी कि 
प्रेम अकेलेपन का ही  पर्याय है
 दुःख का   दूसरा नाम प्रेम ही तो है 
प्रेम में निरंतर अकेले हो जाना 
ही तो हमारे प्रेम की उपलब्धि थी/ 
एकांत का बीहड़पन ही तो 
हमने पाया था अपने प्रेम में 
जिसमें हम ताउम्र भटकते रहे 
हमने  प्रेम  किया था ...... 

मंगलवार, 28 फ़रवरी 2012

बंद की राजनीति बंद हो !

बंद ... बंद ..... कल फिर से एक बंद का चेहरा बंगाल को देखना पड़ा /  पता नहीं  बंगाल कब इस बंद के कल्चर से उबरेगा ? यहाँ बंद के नाम पर जिस प्रकार की राजनीति की जाती है वह अपने आप में बेहद खतरनाक भी है और बेहद उबाऊ भी है / हड़ताल  और बंद के जरिए पता नहीं किन मुद्दों  को सुलझाया  जाता है  , यह मुझे आज तक  समझ में  नहीं आया है /  ममता की सरकार ने इसे अपनी प्रतिष्ठा का सवाल बना दिया  और सरकार की तरफ से जो कदम उठाने चाहिए थे उसने उठाया /सरकारी  गाड़ियाँ दौड़तीं रहीं वीरान सड़कों पर / रेल गाड़ियाँ पटरिओं पर समय पर चलती रहीं / पर बंगाल की जनता  सड़कों पर नहीं निकली क्योंकि वह  बंद  को एक छुट्टी के तौर पर लेती है / जो लोग सड़कों पर दिखे या अपने - अपने  दफ्तरों  में  दिखे , वे सभी सरकारी कर्मचारी थे जिनमें ९०% अपनी सर्विसे या नौकरी बचाने आये थे  क्योंकि सरकार की तरफ से बाकायदा धमकी दी गई थी या कड़ा निर्देश दिया गया था कि जो नहीं आयेंगे उन्हें देखा जायेगा / यह सरकार की एक सफल  रण नीति थी जो कारगर भी सिद्ध हुई /
एक सवाल यह भी उठता है कि आने वाले दिनों में हमें अपने विरोध और मांगों के लिए बंद के अलावा अन्य  विकल्पों  की तलाश किस दिशा में करनी होगी ? अब सारे राजनीतिक दलों को इस दिशा में अपने सरे मतविरोधों को दरकिनार करके सोचना पड़ेगा  /

शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2012

मुक्ति 

उसने मुझसे  कहा-
मैं तुम्हें  मुक्त करती हूँ
अपने रिश्तों से ,
अपनी  चिंताओं  से
अपने प्यार से /

सोचता हूँ
मुक्त करना
क्या सचमुच मुक्त करना होता है ?
kabhi  मुक्तिबोध ने कहा था
मुक्ति कभी अकेले की नहीं होती /
 इसलिए कहाँ  हो पाते  हैं  हम मुक्त ?

हम- तुम एक दूसरे से
अलग होकर
अलग -अलग   दिशाओं  में
मुक्ति की तलाश करते रहे
और
एक दूसरे को मुक्त करने का
स्वांग  भरते रहे /
पर जितना भी स्वांग  भरे
मुक्त होना संभव  नहीं है
क्योंकि
रिश्तों से, चिंताओं से , प्यार से
मुक्त होना
शायद  हमारे मरने  की
निशानी होगी /

मुक्ति

उसने मुझसे  कहा-
मैं तुम्हें  मुक्त करती हूँ
अपने रिश्तों से ,
अपनी  चिंताओं  से
अपने प्यार से /

सोचता हूँ
मुक्त करना
क्या सचमुच मुक्त करना होता है ?
लाभी मुक्तिबोध ने कहा था
मुक्ति कभी अकेले की नहीं होती /
 इसलिए कहाँ  हो पाते  हैं  हम मुक्त ?

हम- तुम एक दूसरे से
अलग होकर
अलग -अलग   दिशाओं  में
मुक्ति की तलाश करते रहे
और
एक दूसरे को मुक्त करने का
स्वांग  भरते रहे /
पर जितना भी स्वांग  भरे
मुक्त होना संभव  नहीं है
क्योंकि
रिश्तों से, चिंताओं से , प्यार से
मुक्त होना
शायद  हमारे मरने  की
निशानी होगी /

शनिवार, 11 फ़रवरी 2012

कविता पढ़ते हुए

न जाने क्यूँ मैं कविता पढ़ते हुए 
उदास हो जाता हूँ ?
कविता की दुनिया में 
मेरे हिस्से का दुःख 
अक्सर खड़ा मिल जाता है /
अपने सन्नाटे से बचने के लिए 
मैं कविता की दुनिया में दाखिल 
होता हूँ पर वहां वह सन्नाटा 
भी अकेलेपन की चादर  ओढ़े 
खड़ा रहता है मेरे इंतज़ार में /
पता नहीं कविता में इतना दुःख 
किसने लाकर चुपके से रख दिया है 
और अकेलापन   लुकाछिपी 
खेलते हुए आ दुबका है 
कविता की  ओट में किसी  बच्चे  की तरह/
कभी हमने रचा था कविता को 
अपने दुःख से बचने के लिए 
सन्नाटे के बीहड़पन से 
उबरने के लिए 
पर पता नहीं क्यों ?
मुझे लगता है
 शायद दुःख और सन्नाटे से 
बचना मनुष्य की सबसे 
नासमझ चेष्टा है/ 

अधेड़ होती स्त्री

अधेड़ होती स्त्री 
अब अपने बारे में ज्यादा नहीं सोचती 
सोचना उसने अब बंद कर दिया है /
चुपचाप धीमे - धीमे वह 
सबकुछ स्वीकारती चली जा रही है 
जानती है वह
 कि अब वह धीरे- धीरे चुक रही है /
अब वह अपने बारे में ज्यादा नहीं सोचती  
सोचना उसने अब बंद कर दिया है /
खुला रहता है उसके घर का दरवाजा 
पर बंद रहता है उसके मन का किवाड़ 
उसे पता है  कि
लोग भी अब उसके बारे में नहीं सोचते /
वह कटती जाती है अपने आस- पास से 
अधेड़ होती स्त्री 
घिरती जाती है 
एक सन्नाटे में 
जो उसका अपना होकर भी 
उसका नहीं होता/
वह बिनती रहती है 
कुछ लम्हों को , कुछ पलों को 
स्मृतियों की पुरानी पड़ती जा रही कोटर से
कुछ चेहरों को झाड़ती-   पोंछती    रहती है 
वापस सहेज कर रखने के लिए /
अधेड़ होती स्त्री 
अब अपने बारे में ज्यादा नहीं सोचती / 

रविवार, 8 जनवरी 2012

विजयदेव नारायण साही की अंतिम काव्य कृति " साखी  " की अंतिम कविता " प्रार्थना : गुरु कबीरदास के लिए " से कुछ पंक्तियां ---

दो तो ऐसी निरीहता  दो
कि इस दहाड़ते  आतंक के बीच
फटकार कर सच बोल सकूँ
और इसकी चिंता न  हो
कि   इस बहुमुखी युद्ध में
मेरे सच का इस्तेमाल
कौन अपने पक्ष में करेगा ?
.................
यह भी न दो
तो इतना ही दो
कि बिना मरे चुप रह सकूँ /