शनिवार, 23 जुलाई 2011

अंखियों का पनिया जाना !

      इन अंखियों का क्या करूँ ? सखी !
      जो बात -बात में पनिया जाती हैं 

       मनवा भी इन्हीं का साथ देता है 
                    सुनता ही नहीं है 
      राह जोहता है , बाट निहारता है उनकी
                  जो आने वाले नहीं हैं /


कैसे  समझाऊँ  सखी ?
यह मनवा न जाने कहाँ हिरा जाता है ?
बीते दिनों के उजाड़ वन में
फिर थक- हार कर लौट आता है
और अँखियाँ फिर
       पनिया जाती हैं सखी !

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