सोमवार, 27 जून 2011

सागर

      तुमसे मिलने के लिये

न जाने कितनी नदियाँ

पहाड़ों से भागती , दौड़ती, उछलती कूदती

                                     चली आती हैं /
उनमें  बेचैनी होती है

तुमसे मिलने के लिये

पर तुम उतने बेचैन नहीं दिखते

तुम अपनी विशाल बाँहों को फैला देते हो 

और नदियाँ तुममें समां जाती    हैं /

अपने वजूद को मिटाकर तुम्हें भर देती हैं
जानते हो ऐसा क्यूँ होता है ?

क्योंकि   नदियाँ स्त्री  होती हैं
हर नदी अपने आप में एक स्त्री है /

और सागर ! तुम

तुम एक पुरुष हो
जो अपने अहम् को विसर्जित  नहीं करता
वह अपनी टेक पर अड़ा रहता है

तुम्हें सबकुछ चाहिए
पर तुम दे नहीं सकते

हाँ, रात -दिन भयंकर या करुण
गर्जना कहें या पुकार
मचती रहती है तुम्हारे अंतर्मन में
लेकिन अपनी झूठी टेक के कारण
तुम नहीं लांघते अपने किनारों  को
तुम नदियों से मिलने पहाड़ों पर नहीं जाते /

हाँ,  चट्टानों से टकराते  अवश्य  हो
लेकिन सच्चाई तो और ही कुछ है
टकराती तो तुम्हारी लहरें हैं चट्टानों से
लहरें भी तो स्त्री ही हैं
हर लहर अपने आप में एक स्त्री है /
चट्टान ! वह भी तुम्हारी तरह पुरुष है
वह भी नहीं जाता लहरों के पास
लहरें ही जाती हैं उसके पास /

सागर! मैं तुमसे पूछना चाहती हूँ
तुम्हें प्यार चाहिए ,
समर्पण चाहिए ,
त्याग चाहिए
अपनापन चाहिए
घुलकर मिलकर मिटनेवाला चाहिए 
पर यही सबकुछ
अगर कोई तुमसे चाहे
तो तुम क्या दे सकते हो ?
हाँ, यह हो सकता है कि तुम यह कहो-
मैं भी तो जलता हूँ, तड़पता हूँ  
पर अपनी सीमा को तोड़ नहीं पता
 अगर मैं अपनी सीमा को तोड़ दूँ
तो प्रलय आ जायेगा /

जानती हूँ मैं 
कितनी झूठी कोशिश है 
अपने अहम् को बचाने की ?  

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