ले - देकर एक जिंदगी हिस्से आई है और उसमें भी कुछ ऐसे लोग सौगात में मिले हैं जिन्होंने जिंदगी में दुःख और वीरानेपन के आलावा कुछ नहीं दिया/ लिखनेवाले ने क्या - क्या लिख दिया जिंदगी के पन्नों पर / कभी - कभी सोचती हूँ कि इस जिंदगी का क्या अर्थ है , इसके क्या मायने हैं / इसको समझ सकने में असमर्थ हूँ / एक सिरे को सुलझाती हूँ तो दूसरा सिरा उलझ जाता है / अजीब - सी उलझन में उलझती जाती है यह जिंदगी / कभी खीझती हूँ इस पर / फिर थक - हार कर इसकी हर सजा स्वीकार कर लेती हूँ / पढ़ने - लिखने के क्रम में यही सीखा कि नियति कुछ नहीं होती आपके करम सब कुछ होते हैं / पर जैसे - जैसे जिंदगी बड़ी होती गई वह मुझे सिखाती गई कि नियति से आप लड़ नहीं सकते / उसे हर मोड़ पर स्वीकारना पड़ता है / कर्म से सब कुछ जीता नहीं जा सकता / इन बातों से आप सोच सकते हैं कि मैं निराश हूँ। . आप सही हैं / मैं सचमुच निराश हो गई हूँ/ मुझे बड़ी- बड़ी बातें अब नहीं सुहाती / मेरे हिस्से जटिल जिंदगी आई है और। …। मेरे लिए कोई रास्ता रौशनी नहीं लेकर आता / ऐ.. जिंदगी तुझसे अब कोई चाह नहीं /
रविवार, 21 दिसंबर 2014
बुधवार, 22 अक्टूबर 2014
शनिवार, 11 अक्टूबर 2014
मेरी स्मृतियों की सुरंग से निकलती है वह कोयले से चलनेवाली , काली -सी भारी- भरकम इंजन के साथ नौ डिब्बों वाली रेलगाड़ी / रुकती है वह उस छोटे - से स्टेशन पर , जो इतिहास में बकुलहाँ स्टेशन के नाम पर दर्ज है / इसका नाम बकुलहाँ क्यों पड़ा , इसके बारे में तथ्य तो नहीं मिलता पर बड़े - बुजुर्गों के मुँह से सुना है कि इस इलाक़े में सफेद बगुले बहुतायत में पाए जाते थे इसीलिए इसका नाम बकुलहाँ पड गया / वैसे इस इलाक़े में बबूल के पेड़ भी बहुत हैं / यहाँ एक सिंगल लाइन हुआ करती थी अब तो डबल लाइन है / यह लाइन छपरा और बलिया को जोड़ती थी / मेरी स्मृतियों का एक अहम हिस्सा मेरे इस पैतृक स्टेशन से जुड़ा हुआ है / मैं अपनी आजी के साथ इस स्टेशन से मिलने बार - बार आती थी / इसके पीछे बहुत बड़ी वजह थी / और वह वजह थी इस स्टेशन के बगल से बहती हुई वह सरयू नदी / बचपन में हम उसे गंगा कहते थे / बचपन में हमारे लिए सब नदियाँ गंगा ही थीं / हमारी आजी बहुत व्रत और उपवास करती थीं / केवल आजी ही नहीं , बल्कि गाँव की बाकी औरतें भी उपवास और व्रत रखती थी / उपवास और व्रत के दौरान सब औरतें गंगा नहाने जाती थी / हमारे यहाँ नदियों और औरतों में एक गहरा और आत्मीय रिश्ता होता था और है / हमारी अपनी पुरखन औरतें अपना सुख - दुख नदियों से बाँटा करती थीं / उनके अधिकांश गीत नदियों को संबोधित करते हुए हैं / गंगा को पियरी धोती चढ़ाते हुए औरतें उलासित होकर गीत गति थीं / बेटे - बेटी के व्याह का न्योता देती थी और गुहार लगती थीं क़ि हे गंगा मैया ..अ ईओ हो /मंगलवार, 23 सितंबर 2014
अँधेरा है पर उम्मीद भी
मेरे समय के शब्द
जोखिम उठाने से डरते हैं
एक घना अंधकार
धीरे - धीरे उत्तर आया है
हमारी जिह्वा/ पर
और
हम लगातार
एक लय में सिर हिलाते
कोरस में
कुछ बुदबुदाते
चल पड़े हैं
उस ईश्वर की शरण में
जो हमारी ही तरह
असमर्थ है
बेबस है
निरीह है
वह भी जोखिम उठाने से डरता है /
सुना है
आजकल
वह भी
ताकतवरों की ही सुनता है
उनक हाँ में हाँ मिलाता है
और
उनकी प्रार्थनाओं पर
मौन होकर मुस्कुराता है /
ताकतवर। ...
और ताकतवर होते जा रहे हैं
बढ़ रही है उनकी ताकत
झुक रहे हैं सिर
उनके सज़दे में
कट रहीं हैं जीभें
नापी जा रही हैं गर्दनें /
पर यही पूरा सच नहीं है
एक सच और है
दुनिया का सौंदर्य
बदलता है
उम्मीद से /
और मेरे पास
अँधेरा भी है
और उम्मीद भी /
जोखिम उठाने से डरते हैं
एक घना अंधकार
धीरे - धीरे उत्तर आया है
हमारी जिह्वा/ पर
और
हम लगातार
एक लय में सिर हिलाते
कोरस में
कुछ बुदबुदाते
चल पड़े हैं
उस ईश्वर की शरण में
जो हमारी ही तरह
असमर्थ है
बेबस है
निरीह है
वह भी जोखिम उठाने से डरता है /
आजकल
वह भी
ताकतवरों की ही सुनता है
उनक हाँ में हाँ मिलाता है
और
उनकी प्रार्थनाओं पर
मौन होकर मुस्कुराता है /
ताकतवर। ...
और ताकतवर होते जा रहे हैं
बढ़ रही है उनकी ताकत
झुक रहे हैं सिर
उनके सज़दे मेंकट रहीं हैं जीभें
नापी जा रही हैं गर्दनें /
पर यही पूरा सच नहीं है
एक सच और है
दुनिया का सौंदर्य
बदलता है
उम्मीद से /
और मेरे पास
अँधेरा भी है
और उम्मीद भी /
शुक्रवार, 1 अगस्त 2014
मंगलवार, 22 जुलाई 2014
यह कौन - सी जगह है दोस्तों। .... जहाँ अकेलेपन के अलावा कुछ नहीं / अकेलेपन को साथ देने के लिए ये पहाड़ हैं जो न जाने कितनी सदियों से सर्द में लिपटे मौन खड़े हैं / इनके पास न मेरे अकेलेपन का कोई हल है न मेरे सवालों का कोई जवाब नहीं /
इस बिराने में कुछ अच्छा नहीं लग रहा है / वक्त है कि मानों कहीं ठहर - सा गया है / न पढ़ने में मन लग रहा है न कुछ सार्थक लिखने में / इस वीराने की रखवाली कर रही हूँ मैं / अजीब - सा दौर है / आछे दिन पाछे गए /
इस बिराने में कुछ अच्छा नहीं लग रहा है / वक्त है कि मानों कहीं ठहर - सा गया है / न पढ़ने में मन लग रहा है न कुछ सार्थक लिखने में / इस वीराने की रखवाली कर रही हूँ मैं / अजीब - सा दौर है / आछे दिन पाछे गए /
मंगलवार, 6 मई 2014
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